Maha Shivratri Bhajan aarti story

Maha Shivratri Bhajan aarti story

30 को महाशिवरात्रि है और इस दिन श्रद्धालु शिवजी की आरती कर के उनकी पूजा करते हैं।

हम आपको बता रहे है शिव जी की आरती  ॐ जय शिव ओंकारा

शिवजी की आरती

ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा।
ब्रह्मा, विष्णु, सदाशिव, अर्द्धांगी धारा॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

एकानन चतुरानन पञ्चानन राजे।
हंसासन गरूड़ासन वृषवाहन साजे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

दो भुज चार चतुर्भुज दसभुज अति सोहे।
त्रिगुण रूप निरखते त्रिभुवन जन मोहे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

अक्षमाला वनमाला मुण्डमाला धारी।
त्रिपुरारी कंसारी कर माला धारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

श्वेताम्बर पीताम्बर बाघम्बर अंगे।
सनकादिक गरुणादिक भूतादिक संगे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

कर के मध्य कमण्डलु चक्र त्रिशूलधारी।
सुखकारी दुखहारी जगपालन कारी॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

ब्रह्मा विष्णु सदाशिव जानत अविवेका।
मधु-कैटभ दो‌उ मारे, सुर भयहीन करे॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

लक्ष्मी व सावित्री पार्वती संगा।
पार्वती अर्द्धांगी, शिवलहरी गंगा॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

पर्वत सोहैं पार्वती, शंकर कैलासा।
भांग धतूर का भोजन, भस्मी में वासा॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

जटा में गंग बहत है, गल मुण्डन माला।
शेष नाग लिपटावत, ओढ़त मृगछाला॥
ॐ जय शिव ओंकारा॥

काशी में विराजे विश्वनाथ, नन्दी ब्रह्मचारी।
नित उठ दर्शन पावत, महिमा अति भारी॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

त्रिगुणस्वामी जी की आरति जो कोइ नर गावे।
कहत शिवानन्द स्वामी, मनवान्छित फल पावे॥

ॐ जय शिव ओंकारा॥

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महाशिवरात्रि पर भगवान शिव की विधिवत पूजा के साथ कुछ अन्य पूजा करने का अपना अलग महत्त्व होता है।

खास ये है की इस बार महाशिवरात्रि सोमवार को है इसलिए इसका महत्‍व काफी ज्‍यादा बढ़ जाता है।

आज के दिन जगह जगह के मंदिर में भगवान शिव के भजन और आरती गूंज रहे होते हैं।

भोले बाबा को रुद्र तो कोई भोलेनाथ के नाम से पुकारता है।

भगवान शिव की अराधना करते वक्‍त अगर उनकी आरती गायी जाए तो आपकी पूजा समझिये संपन्‍न हो गई।

भगवान शिव को अड़भंगी कहा जाता है क्योंकि वह नियम, कायदे और ताम-झाम जैसी दिखावटी चीजों से दूर, सादगी पसंद हैं।

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उनके भक्त भी उनकी ही तरह सादगी वाले होने चाहिए।

भगवान शिव की आरती और भजन करने मात्र से आप उन्हें प्रसन्न कर सकते हैं।

Maha shivratri 2019 का शुभ मुहूर्त

जहां तक शुभ मुहूर्त की बात है तो इस दिन जबसे शिवरात्रि आरम्भ होती है और समाप्त होने तक दिन रात शिव पूजा कर सकते हैं।

यह बात वैदिक और पौराणिक है। इसमें विशेष मुहूर्त में हम अभिजीत, अमृत काल या विजय मुहूर्त को शामिल कर सकते हैं।

यहां तक कि राहुकाल के समय भी भगवान का अभिषेक शिवरात्रि में होता है।

महाशिवरात्रि को करें महामृत्युंजय मंत्र का जप –

इस दिन महामृत्युंजय मंत्र के जप से रोगों से मुक्ति मिलती है तथा व्यक्ति दीर्घायु होता है।

गंभीर रोग से पीड़ित लोग निश्चित संख्या मवन शिवमंदिर में महामृत्युंजय मंत्र का अनुष्ठान बैठाएं।

Maha shivratri 2019 famous shiva temple:

महाशिवरात्रि को लेकर देशभर में खूब तैयारियां चल रही हैं।

हिंदू धर्म में महाशिवरात्रि का बेहद खास महत्व है।

मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान शिव और मां पार्वती का विवाह हुआ था |

इसी पावन उपलक्ष्य के अवसर पर भगवान शिव की पूजा उपासना की जाती है।

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पूरी रात श्रद्धालु जागकर शिव भगवान की पूजा अर्चना करते हैं और उनकी कृपा पाते हैं।

आज यहां महाशिवरात्रि के पावन मौके पर हम आपको देश के कुछ चमत्कारिक मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं।

आपको बता दें कि उज्जैन स्थित महाकालेश्वर मंदिर का बड़ा महत्व है।

इसके अलावा काशी स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर जबकि तीसरा बड़ा मंदिर देवघर का बैद्यनाथ मंदिर।

उज्जैन (महाकाल मंदिर)

उज्जैन स्थित महाकाल एक मात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है जो दक्षिणमुखी है।

बता दें कि महाकाल की भस्मारती विश्व भर में प्रसिद्ध है।

मान्यता है कि महाकाल की पूजा करने से आयु से संकट टल जाता है।

इसके अलावा यहां भगवान कालभैरव का भी मंदिर है।

यह मंदिर क्षिप्रा नदी के किनारे भैरवगढ़ क्षेत्र में स्थित है।

इस मंदिर की विशेषता है कि यहां भगवान कालभैरव की प्रतिमा को शराब का भोग लगाया जाता है।

आश्चर्य की बात ये है कि यह शराब कहां जाती है, ये रहस्य आज भी बना हुआ है।

रोज हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं और इस चमत्कार को अपने आंखों से देखते हैं।

यहां श्रद्धालुओं को भगवान कालभैरव को शराब का सेवन कराते समय सेवा का भाव रखना चाहिए।

वाराणसी (काशी विश्वनाथ का मंदिर)

वाराणसी स्थित काशी विश्वनाथ का ज्योतिर्लिंग बनारस में स्थापित है।

काशी का धर्म के मामले में बड़ा महत्व है।

ऐसी मान्यता है कि प्रलय आने पर भगवान शिव काशी को अपने त्रिशूल पर धारण कर लेंगे।

लोगों का मानना है कि शिव की नगरी काशी में महादेव साक्षात वास करते हैं।

काशी गंगा के पवित्र तट पर बसी है। यहां बसे भोलेनाथ को बाबा विश्वनाथ कहते हैं।

कहते हैं कि अगर कोई भक्त बाबा विश्वनाथ के दरबार में हाजिरी लगाता है तो उसे जन्म-जन्मांतर के चक्र से मुक्ति मिल जाती है |

बाबा का आशीर्वाद अपने भक्तों के लिए मोक्ष का द्वार खोल देता है।

ऐसी मान्यता है कि एक भक्त को भगवान शिव ने सपने में दर्शन देकर कहा था कि गंगा स्नान के बाद उसे दो शिवलिंग मिलेंगे

और जब वो उन दोनों शिवलिंगों को जोड़कर उन्हें स्थापित करेगा तो शिव और शक्ति के दिव्य शिवलिंग की स्थापना होगी और तभी से भगवान शिव यहां मां पार्वती के साथ विराजमान हैं।

देवघर (बाबा बैद्यनाथ)

झारखण्ड स्थित देवघर में यह ज्योतिर्लिंग स्थित है।

इसे सभी 12 ज्योतिर्लिंग में से एक माना जाता है।

इस धाम की महिमा खास है। सावन के महीने में किया गया शिव भक्त कांवड़िए सुल्तानगंज से 105 किमी की कठिन यात्रा को तय कर पहुंचते हैं |

बाबा धाम और सावन के महीने में भोले का अभिषेक कर सात जन्मों का पुण्य कमाते हैं।

मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा जी ने करवाया है।

पुराणों में उल्लेख है कि रावण द्वारा शिवलिंग के रखे जाने और उसे चले जाने के बाद भगवान विष्णु स्वयं इस शिवलिंग के दर्शन के लिए पधारे थे।

तब भगवान विष्णु ने शिव की षोडशपचार पूजा की थी

तब शिव ने विष्णु से यहां एक मंदिर निर्माण की बात कही थी।

इसके बाद विष्णु के आदेश पर भगवान विश्वकर्मा ने आकर इस मंदिर का निर्माण किया था।

Maha Shivratri story

सावन का महीना आरंभ होने के साथ कांवड़ियों के जत्थे कांवड़ यात्रा पर निकल पड़ते हैं।

कांवड़ यात्रा आरंभ होने के पीछे समुद्र मंथन की घटना है।

समुद्र मंथन में निकले विष का पान करने के बाद भगवान शिव का कंठ नीला हो गया।

सभी देवताओं ने हलाहल विष का प्रभाव कम करने के लिए पवित्र गंगाजल, भगवान शिव पर अर्पित करना शुरू कर दिया।

तभी से भगवान शिव के जलाभिषेक की परंपरा का आरंभ माना जाता है।

कांवड़िये हरिद्वार और गौमुख से गंगाजल लाकर भगवान शिव पर अर्पित करते हैं।

सावन माह भगवान शिव की भक्ति का महीना है। इस माह भगवान शिव के जलाभिषेक का विशेष महत्व है।

जलाभिषेक से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।

कांवड़ यात्रा सदियों से चली आ रही है। कहा जाता है कि सबसे पहले भगवान शिव के परमभक्त परशुराम ने सबसे पहली कांवड़ उठाई थी। उन्हें पहला कांवड़िया माना जाता है।

भगवान परशुराम ने बागपत के पास स्थित पुरा महादेव में कांवड़ लाकर जलाभिषेक किया था।

आज भी यहां लाखों शिवभक्त, भोले भंडारी का जलाभिषेक करते हैं।

कुछ लोगों का मानना है कि श्रवण कुमार ने सबसे पहली बार कांवड़ यात्रा की थी।

उनके माता-पिता ने हरिद्वार में गंगा स्नान की इच्छा प्रकट की थी।

कुछ मान्यताओं में भगवान श्रीराम को पहला कांवड़िया माना जाता है।

इस पावन यात्रा में श्रद्धा-विश्वास के साथ शिवभक्त सैकड़ों मील की दूरी पैदल तय करते हैं।

श्रावण मास में कांवड़ के माध्यम से भगवान शिव पर जल अर्पित करने से अत्याधिक पुण्य की प्राप्ति होती है।

भगवान शिव पर अर्पित किया जाने वाला जल गंगाजी की धारा में से ही लिया जाता है। यह यात्रा लगभग 15 दिन चलती है।

Maha Shivratri lyrics

Mr Jatt

I am a song lover from Rohtak Haryana.

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